आज सुबह जब सोकर उठा, तो पता चला कि कल रात को 'अन्ना जी का जनलोकपाल' पास हो गया है। उसके तुरंत बाद महसूस कर रहा हूँ कि, सब कुछ रातों-रात बदल गया है। अचानक ही चारों तरफ इमानदारी और नैतिकता कि हवा फैल गयी है। दूधवाले बिना पानी मिलाये दूध दे रहे हैं। दुकानदार बिना मिलावट किये सही तौल से सामान बेच रहे हैं। सड़कें साफ़-सुथरी हैं बिना किसे के कहे ही नगर-निगम के सफाईकर्मी साफ़-सफाई में जुटे हैं। लोग भी अपने घरों का कूड़ा, कूड़ादान में ही डाल रहे हैं। ठेकेदार इमानदारी से बिना किसी मिलावट के, मानक के अनुसार सड़क, पुल आदि बनाने में लगे हैं। लोग सड़क में नियमानुसार चल रहे हैं, दोपहिया वाहन चालक हेलमेट लगाये हैं और चौपहिया वाहन चालक सीट-बेल्ट लगाये हैं। सरकारी कर्मचारी व अधिकारी समय पर दफ्तर पहुँच रहे हैं और इमानदारी के साथ अपना काम भी कर रहे हैं। शिक्षक वर्ग, टयूसन व कोचिंग बंद कर के क्लास में पढ़ा रहे हैं और विद्यार्थी भी मटरगस्ती करने के बजाये ध्यान लगाये पढ़ रहे हैं। नक़ल व पेपर-लीक जैसे घटनाएँ अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। मीडिया ने पेड-न्यूज देना बंद कर दिया है, और पत्रकार-बन्धु इमानदारी से सही खबरें छाप व दिखा रहे हैं। व्यापारी वर्ग ने मिलावटखोरी व कालाबाजारी बंद कर दी है। वकीलों ने न्यायेपालिका कि दलाली बंद कर दी है और वे अब केस को ज्यादा लम्बा खींचने के बजाये जल्द से जल्द फैसला करवा रहे हैं; और तो और जज भी इमानदारी से फैसला सुनाने में विश्वास रख रहे हैं। सभी कमाने वाले लोग इमानदारी के साथ अपना टैक्स भर रहे हैं, यहाँ तक कि जिन्होंने पहले टैक्स चोरी कि थी वे भी अब टैक्स जमा करने के लिए लाइन लगाये खड़े हैं। ड्राइविंग टेस्ट व मेडिकल जांच के बाद ही इमानदारी से ड्राइविंग लायसन्स बनाये जा रहे हैं। लोग अपने बिजली, पानी, आदि टैक्स इमानदारी से जमा कर रहे हैं। रेलें सही समय से चल रही हैं और लोग टिकेट खरीद कर ही रेल व बस में यात्रा कर रहे हैं। सरकारी व निजी अस्पतालों में गरीबों को मुफ्त इलाज मिल रहा है। अस्पतालों में नर्स व वार्डबॉय पैसा नहीं मांग रहे हैं, डाक्टर भी सेवाभाव से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है। मंदिरों में आने वाले चढ़ावे से पुजारी गरीबों को मुफ्त भोजन व कपड़े बाँट रहे हैं। किसान, सब्जी व अनाज में मिलावट नहीं कर रहे हैं, उनको अपनी पैदावार की पूरी कीमत मिल रही है। लोगों ने अपने अवैध निर्माण व अतिक्रमण स्वयं ही गिरा दिए हैं, साथ ही पार्कों, सरकारी जमीन आदि से कब्जे भी हटा लिए गये हैं। सरकारी राशन दुकान के कोटेदार, नियमानुसार कार्डधारकों को चीनी, मिटटी का तेल आदि समय पर बाँट रहे हैं। नेताओं ने महंगी गाड़ी, हेलीकाप्टर, हवाईजहाज आदि से सफ़र करना बंद कर दिया है और वे अब साधारण गाड़ियों से चल रहे हैं। चोर, लुटेरे, डाकू, बलात्कारी, चैन-स्नैचर, गुंडे, आदि मेहनत व इमानदारी से जीवन यापन करने लगे हैं तथा साथ ही साथ समाजसेवा के कार्य भी कर रहे हैं। विदेशों में पड़ा सारा कालाधन वापस आ गया है और उससे स्कूल, अस्पताल, बिजलीघर, संस्कृतिक-केंद्र आदि बनवाए जा रहे हैं। पुलिसवाले चुस्त-दुरस्त होकर इमानदारी से अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं। आदि, आदि, इत्यादि ...
कुल मिलाकर पूरे भारतीय समाज से भ्रसटाचार, बेईमानी, घूसखोरी, आदि पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है।
उधर नई-दिल्ली के जंतर-मंतर में 'अन्ना जी' का स्थाई निवास व दफ्तर बन गया है। सभी दलों के नेता व आम जनता भी उनके आगे नतमस्तक हो कर बैठी रहती है तथा देश हित के सारे बड़े फैसले भी अब 'अन्ना जी' ही लेते हैं। जो भी 'अन्ना जी' कह देते हैं वही कानून बन जाता है। चूंकि नेताओं ने अब चुनाव लड़ना बंद कर समाजसेवा शुरू कर दी है, इसलिए संसद व विधानसभाओं का अस्तित्व अपने आप ही समाप्त हो गया है।
काश की 'अन्ना जी' का जनलोकपाल पास हो जाये और मेरा सपना सच हो जाये।
बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...
बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...
Sunday, December 11, 2011
Wednesday, September 14, 2011
यह 'दिवस' का मामला बड़ा कनफ्युसिंग है...
कल १४ सितम्बर को 'हिंदी दिवस' था। यानि इस दिन हिंदी को बढ़ावा देना है, उसका प्रचार-प्रसार करना है और उसे जन-जन तक पहुँचाना है। बड़ी अच्छी बात है, आखिर हिंदी हमारी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा दोनों है। लेकिन केवल एक दिन दिवस मना लेने भर से इसका कुछ भला हो पायेगा ऐसा मुझे तो नहीं लगता है। खैर जो भी हो, पर जो भी प्रयास किये जा रहे हैं उनको कोसने के बजाये उसमे सहयोग करना चाहिए। अभी कुछ दिन पहले ११ जुलाई को 'विश्व जनसँख्या दिवस' था। अरे नहीं भाई, इस दिन जनसँख्या को बढ़ावा नहीं देना है, बल्कि दिनोंदिन बढ़ती हुई जनसँख्या को कैसे रोका जाये या घटाया जाये इस पर विचार करना है।
भाई! इसीलिए यह 'दिवस' मुझे जरा समझ में नहीं आते हैं, और कनफ्युस कर देते हैं। मतलब 'हिंदी दिवस' में हिंदी को बढ़ाना है, पर 'जनसंख्या दिवस' में जनसँख्या को घटाना है। इसलिए मेरा एक सुझाव है, कि दिवसों के भ्रमित कर देने वाले नामों को बदल देना चाहिए, जैसे 'हिंदी दिवस' को 'हिंदी बढाओ दिवस' व 'जनसँख्या दिवस' को 'जनसँख्या घटाओ दिवस' कर देना चाहिए। जिससे कम से कम मेरे जैसे, कम पढ़े-लिखे लोग भी इनका मतलब आसानी से समझ सकें।
Monday, August 22, 2011
क्यों राजनेताओं या राजनैतिक दलों को 'अन्ना' के आन्दोलन से दूर रखें ?
मित्रों! मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि 'अन्ना हजारे जी' के इस आन्दोलन से राजनेताओं (राजनैतिक दलों के नेताओं) को दूर रखें। काफी लोगों ने मुझसे यह सवाल किया था कि आखिर ऐसा क्यों।
पहला कारण तो यह है कि अन्ना जी भी शायद यही चाहेते हैं तभी तो उन्होंने अभी तक किसी भी राजनेता को अपने मंच पर जगह नहीं दी है और यही इस आन्दोलन कि अब तक कि सफलता का सबसे बड़ा कारण भी है।
दूसरा कारण यह है कि कोई भी राजनेता चाहे वह किसी भी दल का हो इमानदार नहीं है। अगर ईमानदार होता तो चुनाव में खर्च करने के लिए उसके पास लाखों-करोड़ों रुपये कहाँ से आते हैं?
तीसरा कारण यह है कि राजनेता जिस भी आन्दोलन का हिस्सा बनता है उसमे उसका उद्देश्य, अपना या अपने दल का स्वार्थ पूरा करना होता है। क्योंकि राजनेता का असली मकसद हमेशा सत्ता पाना होता है। उदहारण स्वरुप सन १९९१-१९९२ में अयोध्या में राम-मंदिर आन्दोलन कि मांग पर जब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था तब एक राजनैतिक दल ने उस आन्दोलन को हाईजैक कर लिया था और फिर इस रास्ते से उस दल को तो सत्ता का लाभ मिल गया पर राम-मंदिर का हश्र आज हम सबको पता है। तो कोई राजनेता या राजनैतिक दल अगर इस आन्दोलन में अन्ना के साथ होने का दिखावा करेगा तो वोह तो इस रास्ते से सत्ता पा जायेगा पर देश भ्रसटाचार से मुक्त नहीं हो पायेगा।
इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि अन्ना के इस आन्दोलन से राजनैतिक दलों और राजनेताओं को दूर रखें। यह लड़ाई अन्ना जी कि अगुआई में आम जनता लड़ेगी तो जीत निश्चित मिलेगी।
Wednesday, August 17, 2011
'अन्ना हजारे जी' का आन्दोलन...
'अन्ना हजारे जी' के आन्दोलन के सम्बन्ध में मैं अन्ना जी की टीम से, आन्दोलनकारियों से और इस देश कि जनता से तीन बातें कहना चाहूँगा :-
(१) अन्ना जी का समर्थन करें - आज हमको अन्ना जी के माध्यम से एक मौका मिला है कि हम इस देश कि एक बहुत बड़ी समस्या, भ्रसटाचार को जड़ से उखाड़ फेंके। यदि आज भी हम नहीं जागे तो आने वाली पीढियां हमको कभी माफ़ नहीं करेंगी। हम बिना किसी शर्त या स्वार्थ के अन्ना जी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों और इस आन्दोलन को मजबूती प्रदान करें। दूसरे गांधी के रूप में एक सच्चा और ईमानदार आदमी, उम्र के इस पड़ाव में हमारे लिए लड़ रहा है तो हम दिलोजान से उसका साथ दें और आन्दोलन को अहिंसात्मक बनाये रखें।
(२) स्वयं भी ईमानदार बनें - केवल घूस लेना-देना ही भ्रसटाचार नहीं है, यदि हम अपना कार्य इमानदारी से नहीं करते हैं तो वह भी भ्रसटाचार ही है। इसलिए आइये हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम चाहे जिस भी कार्यक्षेत्र में हों; जैसे सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, विद्यार्थी, शिक्षक, डाक्टर, वकील, पत्रकार आदि; आज से अपने कर्त्तव्य के प्रति मन, वचन व कर्म से इमानदार बनेंगे और रहेंगे। केवल धरना-प्रदर्शन करने, सभा करने, कैंडल मार्च निकलने, उपवास रखने आदि से ही हम अन्ना जी के समर्थक नहीं बन सकते। जब हम स्वयं ईमानदार बनेंगे तभी हम सही मायने में अन्ना जी के आंदोलन के सच्चे समर्थक बन सकते हैं।
(३) राजनेताओं को दूर रखें - इस देश के सभी राजनैतिक दल और उनके नेता एक सौ एक प्रतिशत भ्रस्ट हैं। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन से दूर रखें उनकी बातों में न आयें। राजनेता चाहे जो कुछ भी हों पर इमानदार नहीं हो सकते। राजनेताओं को यदि मौका मिल गया तो वे, इस आन्दोलन में भेड़ के वेश में भेड़िया बनकर घुस जायेंगे और आन्दोलन को नष्ट-भ्रस्ट कर डालेंगे। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन में पास न आने दें।
अंत में मैं अन्ना जी को बधाई देना चाहूँगा जिन्होंने भ्रसटाचार कि इस समस्या को जनांदोलन बनाया और अब हमें इसे मुकाम तक पंहुचाना होगा।
जय-हिंद, जय-भारत।
Monday, August 15, 2011
'स्वतंत्रता दिवस' - क्या हम स्वतंत्र हैं...
आज १५ अगस्त यानी कि 'स्वतंत्रता दिवस' है। आज ही के दिन १९४७ में हमारा देश भारत, अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था, तो फिर इसका जशन होना भी चाहिए। पर स्वतंत्रता या आज़ादी का मतलब क्या सिर्फ इतना है कि साल में एक बार देशभक्ति के गीत सुन लो, तिरंगा फेहरा लो, या स्कूल में लड्डू बाँट दो बस हम आज़ाद हो गये। क्या हम सचमुच में आज़ाद हैं? नहीं, बिलकुल नहीं आज देश का बहुत बड़ा वर्ग 'मीडिया' का गुलाम है। हम वही करते हैं, वही खाते हैं, वही पहनते हैं, वहीँ वोट देते हैं, यहाँ तक कि वही सोचते भी हैं जो टी० वी० चैनल या अखबार हमें बार-बार दिखाते, सुनाते, या पढ़ाते हैं। हम और हमारे विचार या सोच मीडिया के गुलाम हो गये हैं। कुछ नया, कुछ आगे या कुछ अलग हट कर सोचने कि हमारी क्षमता लगभग ख़तम हो गयी है। मीडिया कह दे कि यह सही है तो हम सही मान लेते हैं और कह दे कि गलत है तो हम गलत मान लेते हैं। अरे भाई अपने विचारों को पंख दीजिये, उन्हें ऊँची उड़ान दीजिये। बस यह ध्यान रखना कि विचार सकारात्मक हों।
विचारों या सोच कि स्वतंत्रता ही सही स्वतंत्रता है, केवल राजा बदल जाने से गुलाम आज़ाद नहीं हो जाता है।
Sunday, August 07, 2011
क्या गंगा नदी 'कूड़ादान' है...
आस्ट्रेलिया के ऍफ़. एम्. रेडियो होस्ट, श्रीमान कयले सैन्दीलान्ड्स ने एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान हमारी पवित्रतम नदी गंगा को 'कूड़ादान' कह दिया। भाई, बुरा तो हमको भी लगा क्योंकि हम भी गंगा किनारे के शहर कानपुर में जो बसते हैं। पर बुरा मानने के अलावा हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं। पर, गौर से अगर हम गंगा या भारत की किसी भी अन्य नदी को देखें तो वह 'कूड़ादान' ही नज़र आती हैं, हो सकता है की सैन्दीलान्ड्स महोदय को भी गंगा की कोई ऐसी ही तस्वीर देखने को मिल गयी हो और वो उसे कूड़ादान समझ बैठे हों। और फिर सैन्दीलान्ड्स महोदय ने दरअसल में कुछ गलत भी नहीं कहा उन्होंने तो केवल हमे आईना भर दिखाया है। हम गंगा किनारे रहने वाले अपने घरों का कूड़ा-कचरा फेंकने, उद्योगिक कचरा डालने, सीवर लाइन गिराने, मुर्दे जलाने, पाखाना करने, पूजा करने के बाद मूर्तियाँ व पूजन-सामग्री फेंकने आदि अनेक कामों के लिए गंगाजी का ही इस्तेमाल तो करते हैं। यानि की हम गंगा नदी को 'कूड़ादान' की तरह इस्तेमाल तो कर सकते हैं पर उसे कूड़ादान कह नहीं सकते हैं, और अगर कोई और कह दे तो हमें मिर्ची लग जाती है या हमारी आस्था को चोट पहुँच जाती है। भाई इसी को कहते हैं दोहरे मापदंड अपनाना। होना तो यह चाहिए था कि हम संदिलान्ड्स महोदय की बात को सम्मान पूर्वक ग्रहण करते और यह संकल्प लेते की भविष्य में हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखेंगे। इसी के साथ राम-राम।
Sunday, June 26, 2011
आम... फलों का राजा!
यह 'फलों के राजा आम' का मौसम है, ये कहने को तो 'आम' है पर कुछ 'ख़ास' है। पर इसे फलों का राजा कहते क्यों हैं? एक कारण तो यह भी हो सकता है कि यह राजाओं (या आजकल के नेताओं) कि तरह साल भर में केवल एक बार ही दिखता है, कि भैया जिसको मिलना है मिल लो नहीं तो निकल लो।या यह भी हो सकता है कि इसका स्वाद इतना अच्छा है, कि कोई भी इसको नापसंद नहीं कर सकता है। यही एक ऐसा फल है जिसे अपने स्वाद के कारण चूसकर, निचोड़कर, छीलकर, काटकर काफी बेदर्दी से खाया जाता है। इसे कच्चा और पका दोनों प्रकार से भी खाया जाता है। इसके स्वाद को लेकर एक 'अकबर-बीरबल' का किस्सा भी है-
कहते हैं, एक बार अकबर-बीरबल एक आम के बाग़ में बैठे आम चूस रहे थे और बीरबल आम कि बड़ी तारीफ़ कर रहे थे। तभी वहां से एक गधा निकला और उसने जमीन में पड़े हुए आमों को सूंघा और बिना खाए चला गया। तो अकबर बोले देखो "आम तो गधे भी नहीं खाते हैं"। इस पर बीरबल मुस्कुराकर बोले, "जी हुजूर! आम गधे ही नहीं खाते हैं"।
खैर यह तो एक किस्सा है, पर यह भी सच है कि आम कि इतनी वैराइटी जैसे दशहरी, लंगड़ा, चौउसा, तोतापरी, हापूस, नीलम, केसर, राजापुरी, आम्रपाली, बैंगंपल्ली, सिन्धु, प्यारी, आदि उपलब्ध हैं कि इनको खाए बिना आप रह भी नहीं सकते हैं।
फिर, लोकतंत्र में राजा तो आम के अलावा कोई हो भी नहीं सकता है, चाहे वो 'आम जनता' हो या 'आम फल' हो।
Thursday, June 23, 2011
महात्मा गाँधी का चश्मा भी खो गया...

महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित, सेवाग्राम आश्रम से खबर आई है कि वहां रखा हुआ महात्मा गाँधी जी का चश्मा पिछले दिनों खो गया है। गांधीजी के दिए हुए विचार, सिद्धांत, शिक्षा आदि तो पहले ही समाज से खो चुके हैं। अब उनकी बची-खुची कुछ भौतिक वस्तुएं भी खोती जा रही हैं। वाह रे! मेरे देश।
Friday, June 17, 2011
क्या मात्र कानून बना देने से समस्या हल हो जाएगी?
यदि भ्रसटाचार के खिलाफ लोकपाल अथवा कोई भी सख्त कानून बना दिया जायेगा तो क्या भ्रसटाचार ख़त्म हो जायेगा?
या फिर इसको कुछ यूँ समझें, की दहेज़ को समाप्त करने के उद्देश्य से 'दहेज़ निषेध अधिनियम' १९६१ में बनाया गया था तो क्या उसके बाद समाज से दहेज़ का लेन-देन ख़त्म हो गया, नहीं न। दहेज़ को कानूनी मान्यता भले ही न प्राप्त हो पर इसे सामाजिक मान्यता अवश्य प्राप्त है। सामाजिक मान्यता ऐसे प्राप्त है की दहेज़ का लेन-देन बिना किसी झिझक या डर के किया जा रहा है और अधिक दहेज़ को लेने या देने वाला भी ख़ुशी-ख़ुशी सब को बताता-दिखता है इससे समाज में उसकी इज्जत बढती है। इसलिए दहेज़ रुपी यह अभिशाप समाज से तभी ख़त्म होगी जब पूरा समाज इसके विरोध में उठ खड़ा होगा।
इसी प्रकार से भ्रसटाचार को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है। सुनने में कुछ अजीब लगता है, पर यह सच है, कैसे? किसी की नौकरी लगने पर वेतन के साथ उपरी आय की जानकारी जरूर की जाती है या शादी में दामाद की उपरी आमदनी के बारे में पता किया जाता है, और अगर यह पता चल जाए की उपरी आमदनी नहीं है तो लोग ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे वह बेकार है। भ्रसटाचार के धन से मौज मना रहे लोगों को समाज इज्जत की नजरों से देखता है, कोई यह नहीं कहता है की इससे दूर रहो, यह खराब आदमी है। इन हालातों में भ्रसटाचार से इस देश को मुक्त कराना, देश को आजादी दिलाने से भी ज्यादा कठिन है। इस देश को आजादी दिलाने वालों को तो अपने दुश्मन का पता था और वो बाहरी थे इसलिए उनको मार भगाना फिर भी आसान था, पर भ्रटाचार में लिप्त तो हमारे अपने हैं, जिनको मार भगाना इतना आसान नहीं है।
इन सब का मतलब यह कतई नहीं है कि भ्रसटाचार के विरोध में कानून नहीं बनना चाहिए। कानून भी बनना चाहिए और वो भी बहुत सख्त बनना चाहिए, और बाद में उसका पालन भी कड़ाई से करना चाहिए। पर साथ ही साथ समाज के हरेक व्यक्ति को और हम सबको भी कर्म व वचन से ईमानदार बनना होगा, तभी सही मायने में भ्रसटाचार इस देश से ख़त्म होगा।
या फिर इसको कुछ यूँ समझें, की दहेज़ को समाप्त करने के उद्देश्य से 'दहेज़ निषेध अधिनियम' १९६१ में बनाया गया था तो क्या उसके बाद समाज से दहेज़ का लेन-देन ख़त्म हो गया, नहीं न। दहेज़ को कानूनी मान्यता भले ही न प्राप्त हो पर इसे सामाजिक मान्यता अवश्य प्राप्त है। सामाजिक मान्यता ऐसे प्राप्त है की दहेज़ का लेन-देन बिना किसी झिझक या डर के किया जा रहा है और अधिक दहेज़ को लेने या देने वाला भी ख़ुशी-ख़ुशी सब को बताता-दिखता है इससे समाज में उसकी इज्जत बढती है। इसलिए दहेज़ रुपी यह अभिशाप समाज से तभी ख़त्म होगी जब पूरा समाज इसके विरोध में उठ खड़ा होगा।
इसी प्रकार से भ्रसटाचार को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है। सुनने में कुछ अजीब लगता है, पर यह सच है, कैसे? किसी की नौकरी लगने पर वेतन के साथ उपरी आय की जानकारी जरूर की जाती है या शादी में दामाद की उपरी आमदनी के बारे में पता किया जाता है, और अगर यह पता चल जाए की उपरी आमदनी नहीं है तो लोग ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे वह बेकार है। भ्रसटाचार के धन से मौज मना रहे लोगों को समाज इज्जत की नजरों से देखता है, कोई यह नहीं कहता है की इससे दूर रहो, यह खराब आदमी है। इन हालातों में भ्रसटाचार से इस देश को मुक्त कराना, देश को आजादी दिलाने से भी ज्यादा कठिन है। इस देश को आजादी दिलाने वालों को तो अपने दुश्मन का पता था और वो बाहरी थे इसलिए उनको मार भगाना फिर भी आसान था, पर भ्रटाचार में लिप्त तो हमारे अपने हैं, जिनको मार भगाना इतना आसान नहीं है।
इन सब का मतलब यह कतई नहीं है कि भ्रसटाचार के विरोध में कानून नहीं बनना चाहिए। कानून भी बनना चाहिए और वो भी बहुत सख्त बनना चाहिए, और बाद में उसका पालन भी कड़ाई से करना चाहिए। पर साथ ही साथ समाज के हरेक व्यक्ति को और हम सबको भी कर्म व वचन से ईमानदार बनना होगा, तभी सही मायने में भ्रसटाचार इस देश से ख़त्म होगा।
Wednesday, June 15, 2011
रक्तदान-महादान...
कल, यानी की १४ जून को विश्व रक्तदान दिवस था। रक्त अर्थार्त खून को अभी तक कृत्रिम तरीके से नहीं बनाया जा सका है, पर प्राकृतिक रूप में ही इतना मानव-रक्त उपलब्ध है कि यदि इसकी कमी कि वजह से कोई मरता है तो यह मानव जाति पर कलंक है। हम जरा-जरा सी बात पर खून बहाने को तैयार हो जाते हैं पर जब खून देने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं, घबरा जाते हैं। १८ से ५५ वर्ष का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसका वजन ५० किलो से ज्यादा हो, रक्तदान कर सकता है। एक बार रक्तदान करने के बाद, कम से कम तीन माह बाद ही दोबारा रक्तदान करना चाहिए। रक्तदान से किसी प्रकार की कमजोरी आदि नहीं आती है, क्योंकि हमारा शारीर चौबीस से अड़तालीस घंटे के अन्दर लगभग नब्बे प्रतिशत खून फिर से बना लेता है। रक्तदान से पहले यदि फलों का जूस पी लिया जाये और बाद में यदि गरम चाय या काफी पी ली जाये तो कमजोरी की शिकायत नहीं रहती है, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। एक यूनिट रक्त से तीन मरीजों की जान बचाई जा सकती है और किसी की जान बचाना पुण्य का काम है साथ ही इससे आत्मिक संतोष भी मिलता है। पर, रक्तदान के महत्व को बताने-समझाने की खबरिया चैनलों के पास जगह नहीं है, सरकार के पास शायद बजट नहीं है और हमारे-आपके के पास समय नहीं है। पर, मानवता के नाते हमें इसका महत्व तो समझना ही होगा।
Tuesday, June 07, 2011
बेचारे गांधीजी और राजघाट...
महात्मा गांधीजी बेचारे जब तक जिन्दा रहे तब भी चैन से जी नहीं सके , क्योंकि अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते जीवन बीत गया। और, अब जब मर गये हैं तब भी लोग उन्हें चैन से रहने नहीं दे रहें है। जिसे देखो उनके समाधि-स्थल 'राजघाट' पर धरना देने चला जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले बाबा रामदेव अपने सत्याग्रह से पहले राजघाट पर फूल चढ़ा कर आये ही थे कि, पुलिस ने उनके अनशनस्थल पर लाठीचार्ज कर दिया और पीछे से भाजपा वाले वहां चौबीस घंटे का सत्याग्रह करने पहुँच गये, जिसमे गांधीजी को सुषमा स्वराज जी के ठुमके अलग झेलने पड़ गये। अब, आठ जून को अन्ना हजारे जी वहां एक दिन का सत्याग्रह करने जा रहे हैं। राजघाट जाना इनकी मजबूरी है या गाँधी के प्रति श्रधा यह तो वही जानें, पर शायद इसीलिए कहते हैं 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी'। भैया, मेरी आप सब से अपील है कि जिसका जीवन सुखी न रहा हो, कम से कम मरने के बाद तो उसे परेशान मत करो।
Monday, June 06, 2011
Sunday, June 05, 2011
बाबा रामदेव के सत्याग्रह पर सरकारी दमन...
चार और पांच जून की मध्य रात्रि को, नई-दिल्ली के रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के नेतृत्व में चल रहे सत्याग्रह में, सरकार के इशारों पर पुलिस द्वारा दमनात्मक कार्यवाही की गयी और आन्दोलन को कुचला गया वह लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। साथ ही बाबा रामदेव द्वारा जिस तरह से भीड़तंत्र का सहारा लेकर सरकार को ब्लैकमेल किया जा रहा था वह भी जायज नहीं कहा जा सकता है। लोकतंत्र बनाम भीडतंत्र के इस खेल की निंदा की जानी चाहिए क्योंकि इस लडाई में मारा तो बेचारा आम आदमी ही जाता है।
Friday, June 03, 2011
बाबा रामदेव का अनशन...
योगगुरु परमपूज्यनीय बाबा रामदेव, चार जून से दिल्ली के रामलीला मैदान में बने भव्य पंडाल में, विदेशों में पड़े भारतीय कालेधन को वापस मंगाने की मांग को लेकर अपने समर्थकों के साथ जोर-शोर से अनशन पर बैठने जा रहे हैं। हम तो बाबा के इस कार्य में सफल होने की प्रार्थना इस आशा के साथ कर रहे हैं कि जब यह करोड़ों रूपया वापस देश में आएगा तो कुछ न कुछ तो अपने हाथ भी लग ही जायेगा। भाई क्या करें, अपनी तो आदत ही ऐसी पड़ गयी है कि जब तक निजी स्वार्थ का चश्मा लगाकर चीज़ों को न देखो तब तक तस्वीर साफ़ दिखाई ही नहीं देती। आपको याद होगा कि भ्रसटाचार और कालेधन का मुद्दा तो सबसे पहले बाबा ने ही उठाया था पर बीच में पहले अनशन पर बैठकर अन्ना हजारे जी बाजी मार ले गये और बाबा हाशिये पर चले गये। अब आजकल के नए चलन में ख़बरों के केंद्र में बने रहना भी चूँकि मजबूरी है नहीं तो आपको कोई पूछेगा भी नहीं सो बाबा को भी तो ख़बरों में बने रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। इधर भाजपा भी हाशिये पर चल रही है सो उसने भी सोचा कि चलो बाबा का समर्थन कर दें तो कम से कम ख़बरों में कुछ जगह तो मिल ही जएगी। देश कि जनता ने एक आन्दोलन तो अयोध्या में राम-मंदिर निर्माण का देखा था, जिसमे राजनैतिक दल, साधू-संत, समाजिक संगठन सभी शामिल हुए थे पर उसके बाद रामलला का हश्र आज सबके सामने है। जनता आज फिर, भ्रसटाचार व कालेधन के विरोध का आन्दोलन मुँह बाये, टकटकी लगाये देख रही है। देखिये आगे-आगे होता है क्या?
Wednesday, June 01, 2011
शिर्डी के साईं बाबा...
हाल ही में शिर्डी जाने का अवसर प्राप्त हुआ, निश्चित है की साईं बाबा मंदिर भी दर्शनार्थ जाना था । सो जाने से पहले बाबा के बारे में जानकारी करने हेतु कुछ खंगाला तो पाया की बाबा दरअसल में एक फकीर थे जिनके धर्म व जन्म के बारे में ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। किन्तु एक बात तो पक्की थी की बाबा के पास कुछ अलौकिक शक्तियां थीं जिनका उपयोग बाबा दूसरों की सेवा के लिए करते थे, मांग कर भोजन करते थे, एक कपड़ा लपेटे रहते थे और नीम के पेड़ के नीचे रहते थे। यानी की बाबा ने अपने लिए कभी कुछ एकत्र नहीं किया था, और जब उन्होंने देह त्याग की तब उन्हें शिर्डी में ही भू-समाधी दे दी गयी जहाँ आज उनका भव्य मंदिर बना हुआ है। खैर, इन सब जानकारियों व बाबा के प्रति मन में श्रद्धा लिए हुए शिर्डी पहुंचा तो पाया की वहां बाबा का एक भव्य मंदिर बना हुआ है जिसमे बाबा की मूर्ति सोने के सिंघासन पर सोने का मुकुट धारण किये हुए विराजमान है और सोने का क्षत्र भी ऊपर लगा हुआ है। यह सब देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ की जिस बाबा ने पूरा जीवन एक फकीर के रूप में बिताया आज उसके भक्तों ने उसे सोने से लाद दिया। मित्रों, इससे एक बात तो समझ में आती है की यह संसार भी बड़ा अजीब है, जो सब कुछ त्याग देता है उसे भर-भरकर देता है और जो मांगता है उसे कुछ देता नहीं है।
Thursday, May 19, 2011
उत्तर प्रदेश में बहनजी के मंत्री/विधायक जेल में...

उत्तर प्रदेश में राज कर रहीं बहनजी के बहुत से मंत्री / विधायक जैसे आनंद सेन, शेखर तिवारी, पुरषोत्तम द्विवेदी, अमर मणि त्रिपाठी, आदि किसी न किसी अपराध में सजा पाकर एक-एक कर जेल जा रहे हैं। अब ऐसा भी नहीं कहा जा सकता की सब के सब साफ़-सुथरे व्यक्ति थे और सत्ता में आने के बाद अचानक अपराधी बन गए। दरअसल में बहनजी ने चुनाव जीतने के लिए ऐसे लोगों को टिकट दिए जो महाबली और धनबली थे, उनके अपराधिक इतिहास या छवि पर गौर ही नहीं किया गया। अब चुनाव जीतने के बाद उनसे यह उम्मीद तो नहीं की जा सकती की वह अचानक संत-महात्मा बन जायेंगे। भैया! सियार पालोगे तो शिकार ही करेगा, प्रवचन तो नहीं देगा।
Sunday, May 15, 2011
क्या अब अविवाहित ही राज करेंगे? ...
मई, २०११ में चार राज्यों व एक केंद्र शाषित प्रदेश में चुनाव संपन्न हुए। इनमे से दो राज्यों व एक केंद्र शाषित प्रदेश में होने वाले मुख्यमंत्री, ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), जयललिता (तामिलनाडू) व एन० रंगास्वामी (पुदुचेरी) तीनों ही अविवाहित हैं। पूर्व से शासन कर रहे तीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी (गुजरात), मायावती (उत्तर प्रदेश) व बीजू पटनायक (उड़ीसा) भी अविवाहित हैं।

इससे पहले भी देश के प्रधानमंत्री का पद संभाल चुके अटल बिहारी बाजपाई भी अविवाहित थे, साथ ही उनके समकालीन देश के राष्ट्रपति रहे अब्दुल कलाम भी अविवाहित थे। तो इससे क्या यह समझा जाये की अविवाहितों की संख्या भले ही कम हो पर शासन-सत्ता सँभालने की योग्यता उनमे ज्यादा होती है। या फिर यूँ कहा जाये की वर्तमान में फैलते भ्रस्टाचार में अविवाहित शासक फिर भी जनता को ज्यादा पसंद हैं क्योंकि उनके ज्यादा भ्रष्ट होने की उम्मीद विवाहितों से फिर भी कम है। क्या कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी भी इसीलिए विवाह बंधन से अभी तक दूरी बनाये हुए हैं? खैर जो भी हो पर जनता जनार्दन की जय हो!

इससे पहले भी देश के प्रधानमंत्री का पद संभाल चुके अटल बिहारी बाजपाई भी अविवाहित थे, साथ ही उनके समकालीन देश के राष्ट्रपति रहे अब्दुल कलाम भी अविवाहित थे। तो इससे क्या यह समझा जाये की अविवाहितों की संख्या भले ही कम हो पर शासन-सत्ता सँभालने की योग्यता उनमे ज्यादा होती है। या फिर यूँ कहा जाये की वर्तमान में फैलते भ्रस्टाचार में अविवाहित शासक फिर भी जनता को ज्यादा पसंद हैं क्योंकि उनके ज्यादा भ्रष्ट होने की उम्मीद विवाहितों से फिर भी कम है। क्या कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी भी इसीलिए विवाह बंधन से अभी तक दूरी बनाये हुए हैं? खैर जो भी हो पर जनता जनार्दन की जय हो!
Tuesday, May 10, 2011
पशचिमी उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन
पशचिमी उत्तर प्रदेश में स्थिति नॉएडा, गाजिअबाद, अलीगढ, मथुरा, आगरा आदि जिलों के किसान अपने खेतों के जबरन अधिग्रहण के खिलाफ पिछले कुछ समय से उग्र आन्दोलन कर रहे हैं। उनके आन्दोलन को दबाने के लिए सरकारी बल का प्रयोग बड़ी बेदर्दी से किया जा रहा है।

सरकार, गरीब किसानों की जमीन छीनकर उन्हें बिल्डरों, उद्योगपतियों आदि में बाँट रही है क्योंकि देश के विकास के लिए बिल्डिंगों व उद्योगों की जरूरत है, खाने के अनाज की नहीं। एक बात समझ में नहीं आती है की गरीब किसानों की उपजाऊ जमीनें ही क्यों छिनी जाती हैं? क्या आजादी के बाद से एक भी ऐसा उदहारण है जिसमे किसी धनवान की जमीन छीनी गयी हो। सरकार किसानों को कुछ मुआवजा और लगने वाले उद्योग में नौकरी दे देती है। यानी की किसान को मालिक से उद्योगपति का गुलाम बना दिया जाता है। सरकार को करना तो यह चाहिए की जिस उद्योगपति या बिल्डर को किसान की जमीन दी जाये तो बदले में उसके फार्महाउस आदि किसानों को दे दिए जाएँ। अब जिसका काम खेती करना है वो खेती करे और जिसका काम उद्योग चलाना है वो उद्योग चलाये।

सरकार, गरीब किसानों की जमीन छीनकर उन्हें बिल्डरों, उद्योगपतियों आदि में बाँट रही है क्योंकि देश के विकास के लिए बिल्डिंगों व उद्योगों की जरूरत है, खाने के अनाज की नहीं। एक बात समझ में नहीं आती है की गरीब किसानों की उपजाऊ जमीनें ही क्यों छिनी जाती हैं? क्या आजादी के बाद से एक भी ऐसा उदहारण है जिसमे किसी धनवान की जमीन छीनी गयी हो। सरकार किसानों को कुछ मुआवजा और लगने वाले उद्योग में नौकरी दे देती है। यानी की किसान को मालिक से उद्योगपति का गुलाम बना दिया जाता है। सरकार को करना तो यह चाहिए की जिस उद्योगपति या बिल्डर को किसान की जमीन दी जाये तो बदले में उसके फार्महाउस आदि किसानों को दे दिए जाएँ। अब जिसका काम खेती करना है वो खेती करे और जिसका काम उद्योग चलाना है वो उद्योग चलाये।
Friday, May 06, 2011
ओसामा बिन लादेन को तो मरना ही था

'ओसामा बिन लादेन' को तो मरना ही था, क्योंकि अपनी जिंदगी में वो इतने बुरे काम कर चुका था कि उसे तो पहले ही मर जाना चाहिए था। अब वो कैसे मरा, कब मरा, कहाँ मरा, किसने मारा, क्यों मारा, आदि-आदि प्रशनों पर पूर्ण विराम लगना चाहिए। अब मर गया तो मर गया इतना ही जान लेना जशन मनाने के लिए काफी है। मानवता के दुश्मन कि मृत्यु पर तरह-तरह के सवाल उठाये जाएँ यह तो ठीक नहीं है।
Thursday, April 07, 2011
अन्ना हजारे जी, बढे चलो...

'अन्ना हजारे जी' पांच अप्रैल से जंतर-मंतर, नई-दिल्ली में भ्रसटाचार के खिलाफ 'जन लोकपाल बिल' की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं। आइये, हम सब मिलकर उनका समर्थन करें, पर उससे पहले हम स्वयं इमानदार बनें और अपना आचरण सुधारें।
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