बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...

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Monday, August 22, 2011

क्यों राजनेताओं या राजनैतिक दलों को 'अन्ना' के आन्दोलन से दूर रखें ?

मित्रों! मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि 'अन्ना हजारे जी' के इस आन्दोलन से राजनेताओं (राजनैतिक दलों के नेताओं) को दूर रखें। काफी लोगों ने मुझसे यह सवाल किया था कि आखिर ऐसा क्यों।
पहला कारण तो यह है कि अन्ना जी भी शायद यही चाहेते हैं तभी तो उन्होंने अभी तक किसी भी राजनेता को अपने मंच पर जगह नहीं दी है और यही इस आन्दोलन कि अब तक कि सफलता का सबसे बड़ा कारण भी है।
दूसरा कारण यह है कि कोई भी राजनेता चाहे वह किसी भी दल का हो इमानदार नहीं है। अगर ईमानदार होता तो चुनाव में खर्च करने के लिए उसके पास लाखों-करोड़ों रुपये कहाँ से आते हैं?
तीसरा कारण यह है कि राजनेता जिस भी आन्दोलन का हिस्सा बनता है उसमे उसका उद्देश्य, अपना या अपने दल का स्वार्थ पूरा करना होता है। क्योंकि राजनेता का असली मकसद हमेशा सत्ता पाना होता है। उदहारण स्वरुप सन १९९१-१९९२ में अयोध्या में राम-मंदिर आन्दोलन कि मांग पर जब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था तब एक राजनैतिक दल ने उस आन्दोलन को हाईजैक कर लिया था और फिर इस रास्ते से उस दल को तो सत्ता का लाभ मिल गया पर राम-मंदिर का हश्र आज हम सबको पता है। तो कोई राजनेता या राजनैतिक दल अगर इस आन्दोलन में अन्ना के साथ होने का दिखावा करेगा तो वोह तो इस रास्ते से सत्ता पा जायेगा पर देश भ्रसटाचार से मुक्त नहीं हो पायेगा।
इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि अन्ना के इस आन्दोलन से राजनैतिक दलों और राजनेताओं को दूर रखें। यह लड़ाई अन्ना जी कि अगुआई में आम जनता लड़ेगी तो जीत निश्चित मिलेगी।

Wednesday, August 17, 2011

'अन्ना हजारे जी' का आन्दोलन...

'अन्ना हजारे जी' के आन्दोलन के सम्बन्ध में मैं अन्ना जी की टीम से, आन्दोलनकारियों से और इस देश कि जनता से तीन बातें कहना चाहूँगा :-
() अन्ना जी का समर्थन करें -
आज हमको अन्ना जी के माध्यम से एक मौका मिला है कि हम इस देश कि एक बहुत बड़ी समस्या, भ्रसटाचार को जड़ से उखाड़ फेंके। यदि आज भी हम नहीं जागे तो आने वाली पीढियां हमको कभी माफ़ नहीं करेंगी। हम बिना किसी शर्त या स्वार्थ के अन्ना जी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों और इस आन्दोलन को मजबूती प्रदान करें। दूसरे गांधी के रूप में एक सच्चा और ईमानदार आदमी, उम्र के इस पड़ाव में हमारे लिए लड़ रहा है तो हम दिलोजान से उसका साथ दें और आन्दोलन को अहिंसात्मक बनाये रखें।
() स्वयं भी ईमानदार बनें - केवल घूस लेना-देना ही भ्रसटाचार नहीं है, यदि हम अपना कार्य इमानदारी से नहीं करते हैं तो वह भी भ्रसटाचार ही है। इसलिए आइये हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम चाहे जिस भी कार्यक्षेत्र में हों; जैसे सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, विद्यार्थी, शिक्षक, डाक्टर, वकील, पत्रकार आदि; आज से अपने कर्त्तव्य के प्रति मन, वचन व कर्म से इमानदार बनेंगे और रहेंगे। केवल धरना-प्रदर्शन करने, सभा करने, कैंडल मार्च निकलने, उपवास रखने आदि से ही हम अन्ना जी के समर्थक नहीं बन सकते। जब हम स्वयं ईमानदार बनेंगे तभी हम सही मायने में अन्ना जी के आंदोलन के सच्चे समर्थक बन सकते हैं।
() राजनेताओं को दूर रखें - इस देश के सभी राजनैतिक दल और उनके नेता एक सौ एक प्रतिशत भ्रस्ट हैं। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन से दूर रखें उनकी बातों में न आयें। राजनेता चाहे जो कुछ भी हों पर इमानदार नहीं हो सकते। राजनेताओं को यदि मौका मिल गया तो वे, इस आन्दोलन में भेड़ के वेश में भेड़िया बनकर घुस जायेंगे और आन्दोलन को नष्ट-भ्रस्ट कर डालेंगे। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन में पास न आने दें।
अंत में मैं अन्ना जी को बधाई देना चाहूँगा जिन्होंने भ्रसटाचार कि इस समस्या को जनांदोलन बनाया और अब हमें इसे मुकाम तक पंहुचाना होगा।

जय-हिंद, जय-भारत।

Monday, August 15, 2011

'स्वतंत्रता दिवस' - क्या हम स्वतंत्र हैं...

आज १५ अगस्त यानी कि 'स्वतंत्रता दिवस' है। आज ही के दिन १९४७ में हमारा देश भारत, अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था, तो फिर इसका जशन होना भी चाहिए। पर स्वतंत्रता या आज़ादी का मतलब क्या सिर्फ इतना है कि साल में एक बार देशभक्ति के गीत सुन लो, तिरंगा फेहरा लो, या स्कूल में लड्डू बाँट दो बस हम आज़ाद हो गये। क्या हम सचमुच में आज़ाद हैं? नहीं, बिलकुल नहीं आज देश का बहुत बड़ा वर्ग 'मीडिया' का गुलाम है। हम वही करते हैं, वही खाते हैं, वही पहनते हैं, वहीँ वोट देते हैं, यहाँ तक कि वही सोचते भी हैं जो टी० वी० चैनल या अखबार हमें बार-बार दिखाते, सुनाते, या पढ़ाते हैं। हम और हमारे विचार या सोच मीडिया के गुलाम हो गये हैं। कुछ नया, कुछ आगे या कुछ अलग हट कर सोचने कि हमारी क्षमता लगभग ख़तम हो गयी है। मीडिया कह दे कि यह सही है तो हम सही मान लेते हैं और कह दे कि गलत है तो हम गलत मान लेते हैं। अरे भाई अपने विचारों को पंख दीजिये, उन्हें ऊँची उड़ान दीजिये। बस यह ध्यान रखना कि विचार सकारात्मक हों।
विचारों या सोच कि स्वतंत्रता ही सही स्वतंत्रता है, केवल राजा बदल जाने से गुलाम आज़ाद नहीं हो जाता है।

Sunday, August 07, 2011

क्या गंगा नदी 'कूड़ादान' है...

आस्ट्रेलिया के ऍफ़. एम्. रेडियो होस्ट, श्रीमान कयले सैन्दीलान्ड्स ने एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान हमारी पवित्रतम नदी गंगा को 'कूड़ादान' कह दिया। भाई, बुरा तो हमको भी लगा क्योंकि हम भी गंगा किनारे के शहर कानपुर में जो बसते हैं। पर बुरा मानने के अलावा हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं। पर, गौर से अगर हम गंगा या भारत की किसी भी अन्य नदी को देखें तो वह 'कूड़ादान' ही नज़र आती हैं, हो सकता है की सैन्दीलान्ड्स महोदय को भी गंगा की कोई ऐसी ही तस्वीर देखने को मिल गयी हो और वो उसे कूड़ादान समझ बैठे हों। और फिर सैन्दीलान्ड्स महोदय ने दरअसल में कुछ गलत भी नहीं कहा उन्होंने तो केवल हमे आईना भर दिखाया है। हम गंगा किनारे रहने वाले अपने घरों का कूड़ा-कचरा फेंकने, उद्योगिक कचरा डालने, सीवर लाइन गिराने, मुर्दे जलाने, पाखाना करने, पूजा करने के बाद मूर्तियाँ व पूजन-सामग्री फेंकने आदि अनेक कामों के लिए गंगाजी का ही इस्तेमाल तो करते हैं। यानि की हम गंगा नदी को 'कूड़ादान' की तरह इस्तेमाल तो कर सकते हैं पर उसे कूड़ादान कह नहीं सकते हैं, और अगर कोई और कह दे तो हमें मिर्ची लग जाती है या हमारी आस्था को चोट पहुँच जाती है। भाई इसी को कहते हैं दोहरे मापदंड अपनाना। होना तो यह चाहिए था कि हम संदिलान्ड्स महोदय की बात को सम्मान पूर्वक ग्रहण करते और यह संकल्प लेते की भविष्य में हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखेंगे। इसी के साथ राम-राम।