बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...

बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...

Tuesday, July 28, 2015

जो लोग इस देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार पैदा करना चाहते हैं वे देख लें कि किस तरह से आज सारा भारत एक 'सच्चे मुसलमान' के लिए रो रहा है…

आधुनिक भारत के भगवान चले गए,
देश के असली स्वाभिमान चले गए।

धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए,
एक साथ गीता और कुरान चले गए।

मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए,
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।

इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए,
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।

ज्ञान राशि के अमिट निधान चले गए,
 सबके प्यारे 'अब्दुल कलाम' चले गए।

(साभार : अज्ञात)

Saturday, January 31, 2015

वाह केजरीवाल...


वाह केजरीवाल, वाह !!!

 

तूने दिखा दिया की एक आम आदमी कितना ताकतवर हो सकता है। 

 

तुझ अकेले के कारण आज दिल्ली चुनाव में पूरी मोदी सरकार और पूरी भाजपा, एक पैर पर नाच रही है।

 

तू चुनाव जीते या हारे पर, तूने दिलों को जीत लिया है। 

 

एक ईमानदार, सैकड़ों बेईमानों पर भारी पड़ गया ।

Thursday, January 15, 2015

न, न करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे...

किरण बेदी जी का राजनीती में स्वागत है (न, न करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे)…  इसी के साथ "अन्ना आंदोलन" से जुड़े महत्त्वपूर्ण लोगों जैसे केजरीवाल, वी० के० सिंह,  किरण बेदी, बाबा रामदेव, कुमार विश्वास, आदि-आदि का यह सच भी सामने आ गया की वो जनलोकपाल नहीं बल्कि अपनी-अपनी राजनीतिक हसरतें पूरी करना चाहते थे… अन्ना जी तो बेचारे अब मुँह दिखाने लायक भी नहीं बचे…  जनलोकपाल तो रद्दी की टोकरी में भी ढूंढे नहीं मिलेगा…   देखिये अभी कुछ और सच भी धीरे-धीरे सामने आएँगे…   आम जनता तो हमेशा की तरह ठगी जाएगी… समाजसेवा करने वाले तो कैलाश सत्यार्थी जी की तरह खामोशी से अपना काम करते हैं; तम्बू गाड़कर, माइक लगाकर, भीड़ एकत्रितकर, मीडिया बुलाकर तो केवल राजनीति होती है… जय हो… 

Sunday, June 29, 2014

मोदी सरकार और "हनीमून" ...

सत्ता में 30 दिन पूरे करने वाली अपनी सरकार के कामकाज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिकायत है कि पिछली सरकारों की तरह उन्हें ''हनीमून पीरियड'' नहीं मिला और 100 घंटे में ही आलोचनाएं शुरू हो गईं। क्या दिल्ली में बीजेपी ने केजरीवाल की आलोचना करने में इतंजार किया था ? और कोई भी सरकार ये सोच भी कैसे सकती है कि गरीब जनता और बदहाल सेवाओं के बिस्तर पर वो "हनीमून" मनायेगी..?

Monday, May 14, 2012

क्यों कामचोर होते हैं, सरकारी कर्मचारी?


 अक्सर कहा जाता है की सरकारी कर्मचारी कामचोर होते हैं और यह काफी हद तक सही भी है। पर देखने वाली बात यह है की आखिर ऐसा क्यों है? काफी प्रयासों के बाद मुझे तो कुछ एक यह कारण  समझ में आते हैं :- 
1. कुछ तो जन्मजात कामचोर होते हैं। चाहे वो सरकारी हों  या गैरसरकारी, घर में हों  या बहार हों, वो कामचोर ही होते हैं। सरकारी होने से वो आसानी से बचे रहते हैं। वो 'दास मलूका' के इस दोहे का बखूबी पालन करते हैं की,
                  "अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
                   दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।" 
2. कुछ तो सरकारी होने की वजह से कामचोर हो जाते हैं। यानी की वे वैसे तो कामचोर नहीं होते हैं पर सरकारी नौकरी पाने के बाद यह सोच कर कामचोर हो जाते हैं की अब तो उनका कोई  कुछ बिगाड़ नहीं सकता, चाहे वे काम करें या न करें। 
3. कुछ को यह लगता है की उनसे लिए जा रहे काम के बदले में, उन्हें मिलने वाला वेतन, भत्ते, बोनस, आदि काफी कम है। यानी की काम और वेतन के बीच का उनका एक स्वयं का पैमाना होता है और जब भी उन्हें लगता है की उनका काम उनको मिलने वाले वेतन-लाभों से ज्यादा हो गया है तो वे काम में कटौती या कामचोरी करने लगते हैं या काम के बदले में घूस मांगने लगते हैं।
4. कुछ तो काम करना चाहते हैं पर कार्यक्षेत्र (Workplace) में सुविधाजनक वातावरण (जैसे ख़राब कंप्यूटर, पर्याप्त  रौशनी का न होना,पेन पेंसिल कागज़ की कमी, उचित तापमान का न होना, आदि) के न होने से काम नहीं कर पाते और कामचोरों की श्रेणी में आ जाते हैं।
5. कुछ को यह लगता है की उनका बॉस उनके साथ ठीक व्यवहार नहीं करता है, इसलिए वे  कामचोर हो जाते हैं।यानी की उन्हें लगता है की उनका बॉस पक्षपाती, पूर्वाग्रह से ग्रसित है और उनके काम का उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है, ऐसे में उनके काम का कोई महत्व नहीं है, तो ऐसे में कामचोरी ही एकमात्र विकल्प है। 
6. कुछ अपने सहकर्मियों के साथ सही ताल-मेल नहीं बैठा पाते हैं क्योंकि की उन्हें लगता है की उनका प्रमोसन, पोस्टिंग  आदि उनके सहकर्मियों की अपेक्षा सही समय पर नहीं किया गया है और यह धारणा उन्हें कामचोर बना देती है।
7. कुछ कर्मचारी 'यूनियन' के नेता होने के नाते काम नहीं करते, क्योंकि ऐसा अघोषित नियम बना हुआ है की जो यूनियन का नेता होगा वो काम नहीं करेगा  और न ही उससे काम लिया जायेगा।
8. कुछ सरकारी नौकरी के अलावा अपना कोई निजी व्यवसाय भी चलाते हैं, तो ऐसे में वे अपना ज्यादा समय व उर्जा नौकरी में न देकर अपने निजी कार्य में लगाते हैं, तो जाहिर है की नौकरी में कामचोरी करते हैं। 
9. कुछ अपनी घरेलु समस्याओं, जैसे बूढ़े माँ-बाप, बीमार पत्नी, बच्चों की पढाई, जवान बहिन की शादी, बेरोजगार भाई, आदि से इतने घिरे रहते हैं की उन्हें आफिस के काम की फुर्सत ही नहीं मिलती और कामचोर हो जाते हैं।                                                                                        इन कारणों के सही या गलत का निर्णय आप पर है, साथ ही यह भी निवेदन है की यदि और कोई कारण आपकी जानकारी में हो तो कृपया अवगत कराने का कष्ट करें।

Sunday, January 29, 2012

क्या 'उत्तर प्रदेश - २०१२' के चुनाव में मुद्दा एक बार फिर 'जाति-धर्म' ही रहेगा ?

उत्तर प्रदेश में 'विधान सभा चुनाव-२०१२' का बिगुल बज चूका है। सभी पार्टियाँ पूरे दमखम के साथ मैदान में आ डटी है। पर वोटर खामोश है और मुद्दे गायब है। विकास, कानून-व्यवस्था, भ्रसटाचार आदि कि बातें कोई नहीं कर रहा है; अगर कुछ है तो केवल उलूल-जुलूल वादे। अब तक सभी दलों द्वारा की गयी घोषणाओं का लब्बोलुआब यही है, कि इस बार फिर यह चुनाव 'जाति-धर्म' के मुद्दे पर ही लड़ा जायेगा।
'पंजे' वाली राष्ट्रीय पार्टी अपने युवराज के सहारे नैय्या पार लगाने कि कोशिश कर रही है, पर वो यह बताना नहीं भूलती कि उसने कितने अति-पिछड़ों को टिकट दिया और अल्पसंख्यक आरक्षण लाने का प्रयास केवल उसी के द्वारा किया गया। 'कमल' वाली राष्ट्रीय पार्टी ने जाति विशेष के वोटरों को लुभाने के लिए घोटाले में फंसे एक पूर्व मंत्री को लेने में जरा भी गुरेज नहीं किया और दूसरे प्रदेश कि एक साध्वी-नेत्री को पिछड़े वोटों के लालच में उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया। बाकी बची प्रदेश स्तरीय, 'साइकिल' और 'हाथी' वाली पार्टियां तो जातिगत आधार पर ही फल-फूल रही है। कुछ अन्य पार्टियों या मोर्चों का भी कमोबेश यही हाल है।
सभी पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों कि घोषणा करते समय यह जरूर बताया कि उसने किस जाति और धर्म के कितने लोगों को टिकट दिया है। किसी ने भी यह नहीं बताया कि उसके कितने प्रत्याशी पढ़े-लिखे, इमानदार, समाजसेवी, आदि है।
मतलब साफ़ है कि अभी प्रदेशवासियों को इमानदारी से बिना भेदभाव के विकास करने वाली सरकार के लिए इन्तजार ही करना पड़ेगा। ऐसा भी नहीं है कि सारी गलती पार्टियों कि ही है। अरे! हम भी तो इमानदारी से वोट नहीं डालते है। हम भी तो जाति, धर्म, भौकाल, लालच, भय आदि से प्रभावित होकर वोट देते है।
इमानदारी से वोट डालोगे, तभी तो ईमानदार सरकार पाओगे

Sunday, December 11, 2011

अन्ना जी का जनलोकपाल और मेरा सपना...

आज सुबह जब सोकर उठा, तो पता चला कि कल रात को 'अन्ना जी का जनलोकपाल' पास हो गया है। उसके तुरंत बाद महसूस कर रहा हूँ कि, सब कुछ रातों-रात बदल गया है। अचानक ही चारों तरफ इमानदारी और नैतिकता कि हवा फैल गयी है। दूधवाले बिना पानी मिलाये दूध दे रहे हैं। दुकानदार बिना मिलावट किये सही तौल से सामान बेच रहे हैं। सड़कें साफ़-सुथरी हैं बिना किसे के कहे ही नगर-निगम के सफाईकर्मी साफ़-सफाई में जुटे हैं। लोग भी अपने घरों का कूड़ा, कूड़ादान में ही डाल रहे हैं। ठेकेदार इमानदारी से बिना किसी मिलावट के, मानक के अनुसार सड़क, पुल आदि बनाने में लगे हैं। लोग सड़क में नियमानुसार चल रहे हैं, दोपहिया वाहन चालक हेलमेट लगाये हैं और चौपहिया वाहन चालक सीट-बेल्ट लगाये हैं। सरकारी कर्मचारी व अधिकारी समय पर दफ्तर पहुँच रहे हैं और इमानदारी के साथ अपना काम भी कर रहे हैं। शिक्षक वर्ग, टयूसन व कोचिंग बंद कर के क्लास में पढ़ा रहे हैं और विद्यार्थी भी मटरगस्ती करने के बजाये ध्यान लगाये पढ़ रहे हैंनक़ल व पेपर-लीक जैसे घटनाएँ अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। मीडिया ने पेड-न्यूज देना बंद कर दिया है, और पत्रकार-बन्धु इमानदारी से सही खबरें छाप व दिखा रहे हैं। व्यापारी वर्ग ने मिलावटखोरी व कालाबाजारी बंद कर दी है। वकीलों ने न्यायेपालिका कि दलाली बंद कर दी है और वे अब केस को ज्यादा लम्बा खींचने के बजाये जल्द से जल्द फैसला करवा रहे हैं; और तो और जज भी इमानदारी से फैसला सुनाने में विश्वास रख रहे हैं। सभी कमाने वाले लोग इमानदारी के साथ अपना टैक्स भर रहे हैं, यहाँ तक कि जिन्होंने पहले टैक्स चोरी कि थी वे भी अब टैक्स जमा करने के लिए लाइन लगाये खड़े हैं। ड्राइविंग टेस्ट व मेडिकल जांच के बाद ही इमानदारी से ड्राइविंग लायसन्स बनाये जा रहे हैं। लोग अपने बिजली, पानी, आदि टैक्स इमानदारी से जमा कर रहे हैं। रेलें सही समय से चल रही हैं और लोग टिकेट खरीद कर ही रेल व बस में यात्रा कर रहे हैं। सरकारी व निजी अस्पतालों में गरीबों को मुफ्त इलाज मिल रहा है। अस्पतालों में नर्स व वार्डबॉय पैसा नहीं मांग रहे हैं, डाक्टर भी सेवाभाव से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है। मंदिरों में आने वाले चढ़ावे से पुजारी गरीबों को मुफ्त भोजन व कपड़े बाँट रहे हैं। किसान, सब्जी अनाज में मिलावट नहीं कर रहे हैं, उनको अपनी पैदावार की पूरी कीमत मिल रही है। लोगों ने अपने अवैध निर्माण व अतिक्रमण स्वयं ही गिरा दिए हैं, साथ ही पार्कों, सरकारी जमीन आदि से कब्जे भी हटा लिए गये हैं। सरकारी राशन दुकान के कोटेदार, नियमानुसार कार्डधारकों को चीनी, मिटटी का तेल आदि समय पर बाँट रहे हैं। नेताओं ने महंगी गाड़ी, हेलीकाप्टर, हवाईजहाज आदि से सफ़र करना बंद कर दिया है और वे अब साधारण गाड़ियों से चल रहे हैं। चोर, लुटेरे, डाकू, बलात्कारी, चैन-स्नैचर, गुंडे, आदि मेहनत व इमानदारी से जीवन यापन करने लगे हैं तथा साथ ही साथ समाजसेवा के कार्य भी कर रहे हैं। विदेशों में पड़ा सारा कालाधन वापस आ गया है और उससे स्कूल, अस्पताल, बिजलीघर, संस्कृतिक-केंद्र आदि बनवाए जा रहे हैं। पुलिसवाले चुस्त-दुरस्त होकर इमानदारी से अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं। आदि, आदि, इत्यादि ...
कुल मिलाकर पूरे भारतीय समाज से भ्रसटाचार, बेईमानी, घूसखोरी, आदि पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है।
उधर नई-दिल्ली के जंतर-मंतर में 'अन्ना जी' का स्थाई निवास व दफ्तर बन गया है। सभी दलों के नेता व आम जनता भी उनके आगे नतमस्तक हो कर बैठी रहती है तथा देश हित के सारे बड़े फैसले भी अब 'अन्ना जी' ही लेते हैं। जो भी 'अन्ना जी' कह देते हैं वही कानून बन जाता है। चूंकि नेताओं ने अब चुनाव लड़ना बंद कर समाजसेवा शुरू कर दी है, इसलिए संसद व विधानसभाओं का अस्तित्व अपने आप ही समाप्त हो गया है।
काश की 'अन्ना जी' का जनलोकपाल पास हो जाये और मेरा सपना सच हो जाये।

Wednesday, September 14, 2011

यह 'दिवस' का मामला बड़ा कनफ्युसिंग है...

कल १४ सितम्बर को 'हिंदी दिवस' था। यानि इस दिन हिंदी को बढ़ावा देना है, उसका प्रचार-प्रसार करना है और उसे जन-जन तक पहुँचाना है। बड़ी अच्छी बात है, आखिर हिंदी हमारी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा दोनों है। लेकिन केवल एक दिन दिवस मना लेने भर से इसका कुछ भला हो पायेगा ऐसा मुझे तो नहीं लगता है। खैर जो भी हो, पर जो भी प्रयास किये जा रहे हैं उनको कोसने के बजाये उसमे सहयोग करना चाहिए।
अभी कुछ दिन पहले ११ जुलाई को 'विश्व जनसँख्या दिवस' था। अरे नहीं भाई, इस दिन जनसँख्या को बढ़ावा नहीं देना है, बल्कि दिनोंदिन बढ़ती हुई जनसँख्या को कैसे रोका जाये या घटाया जाये इस पर विचार करना है।
भाई! इसीलिए यह 'दिवस' मुझे जरा समझ में नहीं आते हैं, और कनफ्युस कर देते हैं। मतलब 'हिंदी दिवस' में हिंदी को बढ़ाना है, पर 'जनसंख्या दिवस' में जनसँख्या को घटाना है। इसलिए मेरा एक सुझाव है, कि दिवसों के भ्रमित कर देने वाले नामों को बदल देना चाहिए, जैसे 'हिंदी दिवस' को 'हिंदी बढाओ दिवस' व 'जनसँख्या दिवस' को 'जनसँख्या घटाओ दिवस' कर देना चाहिए। जिससे कम से कम मेरे जैसे, कम पढ़े-लिखे लोग भी इनका मतलब आसानी से समझ सकें।

Monday, August 22, 2011

क्यों राजनेताओं या राजनैतिक दलों को 'अन्ना' के आन्दोलन से दूर रखें ?

मित्रों! मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था कि 'अन्ना हजारे जी' के इस आन्दोलन से राजनेताओं (राजनैतिक दलों के नेताओं) को दूर रखें। काफी लोगों ने मुझसे यह सवाल किया था कि आखिर ऐसा क्यों।
पहला कारण तो यह है कि अन्ना जी भी शायद यही चाहेते हैं तभी तो उन्होंने अभी तक किसी भी राजनेता को अपने मंच पर जगह नहीं दी है और यही इस आन्दोलन कि अब तक कि सफलता का सबसे बड़ा कारण भी है।
दूसरा कारण यह है कि कोई भी राजनेता चाहे वह किसी भी दल का हो इमानदार नहीं है। अगर ईमानदार होता तो चुनाव में खर्च करने के लिए उसके पास लाखों-करोड़ों रुपये कहाँ से आते हैं?
तीसरा कारण यह है कि राजनेता जिस भी आन्दोलन का हिस्सा बनता है उसमे उसका उद्देश्य, अपना या अपने दल का स्वार्थ पूरा करना होता है। क्योंकि राजनेता का असली मकसद हमेशा सत्ता पाना होता है। उदहारण स्वरुप सन १९९१-१९९२ में अयोध्या में राम-मंदिर आन्दोलन कि मांग पर जब पूरा देश उठ खड़ा हुआ था तब एक राजनैतिक दल ने उस आन्दोलन को हाईजैक कर लिया था और फिर इस रास्ते से उस दल को तो सत्ता का लाभ मिल गया पर राम-मंदिर का हश्र आज हम सबको पता है। तो कोई राजनेता या राजनैतिक दल अगर इस आन्दोलन में अन्ना के साथ होने का दिखावा करेगा तो वोह तो इस रास्ते से सत्ता पा जायेगा पर देश भ्रसटाचार से मुक्त नहीं हो पायेगा।
इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि अन्ना के इस आन्दोलन से राजनैतिक दलों और राजनेताओं को दूर रखें। यह लड़ाई अन्ना जी कि अगुआई में आम जनता लड़ेगी तो जीत निश्चित मिलेगी।

Wednesday, August 17, 2011

'अन्ना हजारे जी' का आन्दोलन...

'अन्ना हजारे जी' के आन्दोलन के सम्बन्ध में मैं अन्ना जी की टीम से, आन्दोलनकारियों से और इस देश कि जनता से तीन बातें कहना चाहूँगा :-
() अन्ना जी का समर्थन करें -
आज हमको अन्ना जी के माध्यम से एक मौका मिला है कि हम इस देश कि एक बहुत बड़ी समस्या, भ्रसटाचार को जड़ से उखाड़ फेंके। यदि आज भी हम नहीं जागे तो आने वाली पीढियां हमको कभी माफ़ नहीं करेंगी। हम बिना किसी शर्त या स्वार्थ के अन्ना जी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़े हों और इस आन्दोलन को मजबूती प्रदान करें। दूसरे गांधी के रूप में एक सच्चा और ईमानदार आदमी, उम्र के इस पड़ाव में हमारे लिए लड़ रहा है तो हम दिलोजान से उसका साथ दें और आन्दोलन को अहिंसात्मक बनाये रखें।
() स्वयं भी ईमानदार बनें - केवल घूस लेना-देना ही भ्रसटाचार नहीं है, यदि हम अपना कार्य इमानदारी से नहीं करते हैं तो वह भी भ्रसटाचार ही है। इसलिए आइये हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम चाहे जिस भी कार्यक्षेत्र में हों; जैसे सरकारी कर्मचारी, व्यापारी, विद्यार्थी, शिक्षक, डाक्टर, वकील, पत्रकार आदि; आज से अपने कर्त्तव्य के प्रति मन, वचन व कर्म से इमानदार बनेंगे और रहेंगे। केवल धरना-प्रदर्शन करने, सभा करने, कैंडल मार्च निकलने, उपवास रखने आदि से ही हम अन्ना जी के समर्थक नहीं बन सकते। जब हम स्वयं ईमानदार बनेंगे तभी हम सही मायने में अन्ना जी के आंदोलन के सच्चे समर्थक बन सकते हैं।
() राजनेताओं को दूर रखें - इस देश के सभी राजनैतिक दल और उनके नेता एक सौ एक प्रतिशत भ्रस्ट हैं। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन से दूर रखें उनकी बातों में न आयें। राजनेता चाहे जो कुछ भी हों पर इमानदार नहीं हो सकते। राजनेताओं को यदि मौका मिल गया तो वे, इस आन्दोलन में भेड़ के वेश में भेड़िया बनकर घुस जायेंगे और आन्दोलन को नष्ट-भ्रस्ट कर डालेंगे। इसलिए राजनेताओं को इस आन्दोलन में पास न आने दें।
अंत में मैं अन्ना जी को बधाई देना चाहूँगा जिन्होंने भ्रसटाचार कि इस समस्या को जनांदोलन बनाया और अब हमें इसे मुकाम तक पंहुचाना होगा।

जय-हिंद, जय-भारत।