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Friday, June 17, 2011

क्या मात्र कानून बना देने से समस्या हल हो जाएगी?

यदि भ्रसटाचार के खिलाफ लोकपाल अथवा कोई भी सख्त कानून बना दिया जायेगा तो क्या भ्रसटाचार ख़त्म हो जायेगा?
या फिर इसको कुछ यूँ समझें, की दहेज़ को समाप्त करने के उद्देश्य से 'दहेज़ निषेध अधिनियम' १९६१ में बनाया गया था तो क्या उसके बाद समाज से दहेज़ का लेन-देन ख़त्म हो गया, नहीं न। दहेज़ को कानूनी मान्यता भले ही न प्राप्त हो पर इसे सामाजिक मान्यता अवश्य प्राप्त है। सामाजिक मान्यता ऐसे प्राप्त है की दहेज़ का लेन-देन बिना किसी झिझक या डर के किया जा रहा है और अधिक दहेज़ को लेने या देने वाला भी ख़ुशी-ख़ुशी सब को बताता-दिखता है इससे समाज में उसकी इज्जत बढती है। इसलिए दहेज़ रुपी यह अभिशाप समाज से तभी ख़त्म होगी जब पूरा समाज इसके विरोध में उठ खड़ा होगा।
इसी प्रकार से भ्रसटाचार को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है। सुनने में कुछ अजीब लगता है, पर यह सच है, कैसे? किसी की नौकरी लगने पर वेतन के साथ उपरी आय की जानकारी जरूर की जाती है या शादी में दामाद की उपरी आमदनी के बारे में पता किया जाता है, और अगर यह पता चल जाए की उपरी आमदनी नहीं है तो लोग ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे वह बेकार है। भ्रसटाचार के धन से मौज मना रहे लोगों को समाज इज्जत की नजरों से देखता है, कोई यह नहीं कहता है की इससे दूर रहो, यह खराब आदमी है। इन हालातों में भ्रसटाचार से इस देश को मुक्त कराना, देश को आजादी दिलाने से भी ज्यादा कठिन है। इस देश को आजादी दिलाने वालों को तो अपने दुश्मन का पता था और वो बाहरी थे इसलिए उनको मार भगाना फिर भी आसान था, पर भ्रटाचार में लिप्त तो हमारे अपने हैं, जिनको मार भगाना इतना आसान नहीं है।
इन सब का मतलब यह कतई नहीं है कि भ्रसटाचार के विरोध में कानून नहीं बनना चाहिए। कानून भी बनना चाहिए और वो भी बहुत सख्त बनना चाहिए, और बाद में उसका पालन भी कड़ाई से करना चाहिए। पर साथ ही साथ समाज के हरेक व्यक्ति को और हम सबको भी कर्म व वचन से ईमानदार बनना होगा, तभी सही मायने में भ्रसटाचार इस देश से ख़त्म होगा।

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