बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...

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Sunday, June 26, 2011

आम... फलों का राजा!

यह 'फलों के राजा आम' का मौसम है, ये कहने को तो 'आम' है पर कुछ 'ख़ास' है। पर इसे फलों का राजा कहते क्यों हैं? एक कारण तो यह भी हो सकता है कि यह राजाओं (या आजकल के नेताओं) कि तरह साल भर में केवल एक बार ही दिखता है, कि भैया जिसको मिलना है मिल लो नहीं तो निकल लो।
या यह भी हो सकता है कि इसका स्वाद इतना अच्छा है, कि कोई भी इसको नापसंद नहीं कर सकता है। यही एक ऐसा फल है जिसे अपने स्वाद के कारण चूसकर, निचोड़कर, छीलकर, काटकर काफी बेदर्दी से खाया जाता है। इसे कच्चा और पका दोनों प्रकार से भी खाया जाता है। इसके स्वाद को लेकर एक 'अकबर-बीरबल' का किस्सा भी है-
कहते हैं, एक बार अकबर-बीरबल एक आम के बाग़ में बैठे आम चूस रहे थे और बीरबल आम कि बड़ी तारीफ़ कर रहे थे। तभी वहां से एक गधा निकला और उसने जमीन में पड़े हुए आमों को सूंघा और बिना खाए चला गया। तो अकबर बोले देखो "आम तो गधे भी नहीं खाते हैं"। इस पर बीरबल मुस्कुराकर बोले, "जी हुजूर! आम गधे ही नहीं खाते हैं"।
खैर यह तो एक किस्सा है, पर यह भी सच है कि आम कि इतनी वैराइटी जैसे दशहरी, लंगड़ा, चौउसा, तोतापरी, हापूस, नीलम, केसर, राजापुरी, आम्रपाली, बैंगंपल्ली, सिन्धु, प्यारी, आदि उपलब्ध हैं कि इनको खाए बिना आप रह भी नहीं सकते हैं।
फिर, लोकतंत्र में राजा तो आम के अलावा कोई हो भी नहीं सकता है, चाहे वो 'आम जनता' हो या 'आम फल' हो

Thursday, June 23, 2011

महात्मा गाँधी का चश्मा भी खो गया...


महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित, सेवाग्राम आश्रम से खबर आई है कि वहां रखा हुआ महात्मा गाँधी जी का चश्मा पिछले दिनों खो गया है। गांधीजी के दिए हुए विचार, सिद्धांत, शिक्षा आदि तो पहले ही समाज से खो चुके हैं। अब उनकी बची-खुची कुछ भौतिक वस्तुएं भी खोती जा रही हैं। वाह रे! मेरे देश।

Friday, June 17, 2011

क्या मात्र कानून बना देने से समस्या हल हो जाएगी?

यदि भ्रसटाचार के खिलाफ लोकपाल अथवा कोई भी सख्त कानून बना दिया जायेगा तो क्या भ्रसटाचार ख़त्म हो जायेगा?
या फिर इसको कुछ यूँ समझें, की दहेज़ को समाप्त करने के उद्देश्य से 'दहेज़ निषेध अधिनियम' १९६१ में बनाया गया था तो क्या उसके बाद समाज से दहेज़ का लेन-देन ख़त्म हो गया, नहीं न। दहेज़ को कानूनी मान्यता भले ही न प्राप्त हो पर इसे सामाजिक मान्यता अवश्य प्राप्त है। सामाजिक मान्यता ऐसे प्राप्त है की दहेज़ का लेन-देन बिना किसी झिझक या डर के किया जा रहा है और अधिक दहेज़ को लेने या देने वाला भी ख़ुशी-ख़ुशी सब को बताता-दिखता है इससे समाज में उसकी इज्जत बढती है। इसलिए दहेज़ रुपी यह अभिशाप समाज से तभी ख़त्म होगी जब पूरा समाज इसके विरोध में उठ खड़ा होगा।
इसी प्रकार से भ्रसटाचार को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है। सुनने में कुछ अजीब लगता है, पर यह सच है, कैसे? किसी की नौकरी लगने पर वेतन के साथ उपरी आय की जानकारी जरूर की जाती है या शादी में दामाद की उपरी आमदनी के बारे में पता किया जाता है, और अगर यह पता चल जाए की उपरी आमदनी नहीं है तो लोग ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे वह बेकार है। भ्रसटाचार के धन से मौज मना रहे लोगों को समाज इज्जत की नजरों से देखता है, कोई यह नहीं कहता है की इससे दूर रहो, यह खराब आदमी है। इन हालातों में भ्रसटाचार से इस देश को मुक्त कराना, देश को आजादी दिलाने से भी ज्यादा कठिन है। इस देश को आजादी दिलाने वालों को तो अपने दुश्मन का पता था और वो बाहरी थे इसलिए उनको मार भगाना फिर भी आसान था, पर भ्रटाचार में लिप्त तो हमारे अपने हैं, जिनको मार भगाना इतना आसान नहीं है।
इन सब का मतलब यह कतई नहीं है कि भ्रसटाचार के विरोध में कानून नहीं बनना चाहिए। कानून भी बनना चाहिए और वो भी बहुत सख्त बनना चाहिए, और बाद में उसका पालन भी कड़ाई से करना चाहिए। पर साथ ही साथ समाज के हरेक व्यक्ति को और हम सबको भी कर्म व वचन से ईमानदार बनना होगा, तभी सही मायने में भ्रसटाचार इस देश से ख़त्म होगा।

Wednesday, June 15, 2011

रक्तदान-महादान...

कल, यानी की १४ जून को विश्व रक्तदान दिवस था। रक्त अर्थार्त खून को अभी तक कृत्रिम तरीके से नहीं बनाया जा सका है, पर प्राकृतिक रूप में ही इतना मानव-रक्त उपलब्ध है कि यदि इसकी कमी कि वजह से कोई मरता है तो यह मानव जाति पर कलंक है। हम जरा-जरा सी बात पर खून बहाने को तैयार हो जाते हैं पर जब खून देने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं, घबरा जाते हैं। १८ से ५५ वर्ष का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जिसका वजन ५० किलो से ज्यादा हो, रक्तदान कर सकता है। एक बार रक्तदान करने के बाद, कम से कम तीन माह बाद ही दोबारा रक्तदान करना चाहिए। रक्तदान से किसी प्रकार की कमजोरी आदि नहीं आती है, क्योंकि हमारा शारीर चौबीस से अड़तालीस घंटे के अन्दर लगभग नब्बे प्रतिशत खून फिर से बना लेता है। रक्तदान से पहले यदि फलों का जूस पी लिया जाये और बाद में यदि गरम चाय या काफी पी ली जाये तो कमजोरी की शिकायत नहीं रहती है, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। एक यूनिट रक्त से तीन मरीजों की जान बचाई जा सकती है और किसी की जान बचाना पुण्य का काम है साथ ही इससे आत्मिक संतोष भी मिलता है। पर, रक्तदान के महत्व को बताने-समझाने की खबरिया चैनलों के पास जगह नहीं है, सरकार के पास शायद बजट नहीं है और हमारे-आपके के पास समय नहीं है। पर, मानवता के नाते हमें इसका महत्व तो समझना ही होगा।

Tuesday, June 07, 2011

बेचारे गांधीजी और राजघाट...

महात्मा गांधीजी बेचारे जब तक जिन्दा रहे तब भी चैन से जी नहीं सके , क्योंकि अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते जीवन बीत गया। और, अब जब मर गये हैं तब भी लोग उन्हें चैन से रहने नहीं दे रहें है। जिसे देखो उनके समाधि-स्थल 'राजघाट' पर धरना देने चला जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले बाबा रामदेव अपने सत्याग्रह से पहले राजघाट पर फूल चढ़ा कर आये ही थे कि, पुलिस ने उनके अनशनस्थल पर लाठीचार्ज कर दिया और पीछे से भाजपा वाले वहां चौबीस घंटे का सत्याग्रह करने पहुँच गये, जिसमे गांधीजी को सुषमा स्वराज जी के ठुमके अलग झेलने पड़ गये। अब, आठ जून को अन्ना हजारे जी वहां एक दिन का सत्याग्रह करने जा रहे हैं। राजघाट जाना इनकी मजबूरी है या गाँधी के प्रति श्रधा यह तो वही जानें, पर शायद इसीलिए कहते हैं 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी'। भैया, मेरी आप सब से अपील है कि जिसका जीवन सुखी रहा हो, कम से कम मरने के बाद तो उसे परेशान मत करो

Monday, June 06, 2011

और बाबा भाग गए...

बाबा भागे मंच से, धर नारी का वेश
भक्त सब पीटे गये, जल उठा फिर देश।।

Sunday, June 05, 2011

बाबा रामदेव के सत्याग्रह पर सरकारी दमन...

चार और पांच जून की मध्य रात्रि को, नई-दिल्ली के रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के नेतृत्व में चल रहे सत्याग्रह में, सरकार के इशारों पर पुलिस द्वारा दमनात्मक कार्यवाही की गयी और आन्दोलन को कुचला गया वह लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक हैसाथ ही बाबा रामदेव द्वारा जिस तरह से भीड़तंत्र का सहारा लेकर सरकार को ब्लैकमेल किया जा रहा था वह भी जायज नहीं कहा जा सकता है लोकतंत्र बनाम भीडतंत्र के इस खेल की निंदा की जानी चाहिए क्योंकि इस लडाई में मारा तो बेचारा आम आदमी ही जाता है

Friday, June 03, 2011

बाबा रामदेव का अनशन...

योगगुरु परमपूज्यनीय बाबा रामदेव, चार जून से दिल्ली के रामलीला मैदान में बने भव्य पंडाल में, विदेशों में पड़े भारतीय कालेधन को वापस मंगाने की मांग को लेकर अपने समर्थकों के साथ जोर-शोर से अनशन पर बैठने जा रहे हैं। हम तो बाबा के इस कार्य में सफल होने की प्रार्थना इस आशा के साथ कर रहे हैं कि जब यह करोड़ों रूपया वापस देश में आएगा तो कुछ न कुछ तो अपने हाथ भी लग ही जायेगा। भाई क्या करें, अपनी तो आदत ही ऐसी पड़ गयी है कि जब तक निजी स्वार्थ का चश्मा लगाकर चीज़ों को न देखो तब तक तस्वीर साफ़ दिखाई ही नहीं देती। आपको याद होगा कि भ्रसटाचार और कालेधन का मुद्दा तो सबसे पहले बाबा ने ही उठाया था पर बीच में पहले अनशन पर बैठकर अन्ना हजारे जी बाजी मार ले गये और बाबा हाशिये पर चले गये। अब आजकल के नए चलन में ख़बरों के केंद्र में बने रहना भी चूँकि मजबूरी है नहीं तो आपको कोई पूछेगा भी नहीं सो बाबा को भी तो ख़बरों में बने रहने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था। इधर भाजपा भी हाशिये पर चल रही है सो उसने भी सोचा कि चलो बाबा का समर्थन कर दें तो कम से कम ख़बरों में कुछ जगह तो मिल ही जएगी। देश कि जनता ने एक आन्दोलन तो अयोध्या में राम-मंदिर निर्माण का देखा था, जिसमे राजनैतिक दल, साधू-संत, समाजिक संगठन सभी शामिल हुए थे पर उसके बाद रामलला का हश्र आज सबके सामने है। जनता आज फिर, भ्रसटाचार व कालेधन के विरोध का आन्दोलन मुँह बाये, टकटकी लगाये देख रही है। देखिये आगे-आगे होता है क्या?

Wednesday, June 01, 2011

शिर्डी के साईं बाबा...

हाल ही में शिर्डी जाने का अवसर प्राप्त हुआ, निश्चित है की साईं बाबा मंदिर भी दर्शनार्थ जाना था । सो जाने से पहले बाबा के बारे में जानकारी करने हेतु कुछ खंगाला तो पाया की बाबा दरअसल में एक फकीर थे जिनके धर्म व जन्म के बारे में ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। किन्तु एक बात तो पक्की थी की बाबा के पास कुछ अलौकिक शक्तियां थीं जिनका उपयोग बाबा दूसरों की सेवा के लिए करते थे, मांग कर भोजन करते थे, एक कपड़ा लपेटे रहते थे और नीम के पेड़ के नीचे रहते थे। यानी की बाबा ने अपने लिए कभी कुछ एकत्र नहीं किया था, और जब उन्होंने देह त्याग की तब उन्हें शिर्डी में ही भू-समाधी दे दी गयी जहाँ आज उनका भव्य मंदिर बना हुआ है। खैर, इन सब जानकारियों व बाबा के प्रति मन में श्रद्धा लिए हुए शिर्डी पहुंचा तो पाया की वहां बाबा का एक भव्य मंदिर बना हुआ है जिसमे बाबा की मूर्ति सोने के सिंघासन पर सोने का मुकुट धारण किये हुए विराजमान है और सोने का क्षत्र भी ऊपर लगा हुआ है। यह सब देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ की जिस बाबा ने पूरा जीवन एक फकीर के रूप में बिताया आज उसके भक्तों ने उसे सोने से लाद दिया। मित्रों, इससे एक बात तो समझ में आती है की यह संसार भी बड़ा अजीब है, जो सब कुछ त्याग देता है उसे भर-भरकर देता है और जो मांगता है उसे कुछ देता नहीं है।