यह 'फलों के राजा आम' का मौसम है, ये कहने को तो 'आम' है पर कुछ 'ख़ास' है। पर इसे फलों का राजा कहते क्यों हैं? एक कारण तो यह भी हो सकता है कि यह राजाओं (या आजकल के नेताओं) कि तरह साल भर में केवल एक बार ही दिखता है, कि भैया जिसको मिलना है मिल लो नहीं तो निकल लो।या यह भी हो सकता है कि इसका स्वाद इतना अच्छा है, कि कोई भी इसको नापसंद नहीं कर सकता है। यही एक ऐसा फल है जिसे अपने स्वाद के कारण चूसकर, निचोड़कर, छीलकर, काटकर काफी बेदर्दी से खाया जाता है। इसे कच्चा और पका दोनों प्रकार से भी खाया जाता है। इसके स्वाद को लेकर एक 'अकबर-बीरबल' का किस्सा भी है-
कहते हैं, एक बार अकबर-बीरबल एक आम के बाग़ में बैठे आम चूस रहे थे और बीरबल आम कि बड़ी तारीफ़ कर रहे थे। तभी वहां से एक गधा निकला और उसने जमीन में पड़े हुए आमों को सूंघा और बिना खाए चला गया। तो अकबर बोले देखो "आम तो गधे भी नहीं खाते हैं"। इस पर बीरबल मुस्कुराकर बोले, "जी हुजूर! आम गधे ही नहीं खाते हैं"।
खैर यह तो एक किस्सा है, पर यह भी सच है कि आम कि इतनी वैराइटी जैसे दशहरी, लंगड़ा, चौउसा, तोतापरी, हापूस, नीलम, केसर, राजापुरी, आम्रपाली, बैंगंपल्ली, सिन्धु, प्यारी, आदि उपलब्ध हैं कि इनको खाए बिना आप रह भी नहीं सकते हैं।
फिर, लोकतंत्र में राजा तो आम के अलावा कोई हो भी नहीं सकता है, चाहे वो 'आम जनता' हो या 'आम फल' हो।







