आस्ट्रेलिया के ऍफ़. एम्. रेडियो होस्ट, श्रीमान कयले सैन्दीलान्ड्स ने एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान हमारी पवित्रतम नदी गंगा को 'कूड़ादान' कह दिया। भाई, बुरा तो हमको भी लगा क्योंकि हम भी गंगा किनारे के शहर कानपुर में जो बसते हैं। पर बुरा मानने के अलावा हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं। पर, गौर से अगर हम गंगा या भारत की किसी भी अन्य नदी को देखें तो वह 'कूड़ादान' ही नज़र आती हैं, हो सकता है की सैन्दीलान्ड्स महोदय को भी गंगा की कोई ऐसी ही तस्वीर देखने को मिल गयी हो और वो उसे कूड़ादान समझ बैठे हों। और फिर सैन्दीलान्ड्स महोदय ने दरअसल में कुछ गलत भी नहीं कहा उन्होंने तो केवल हमे आईना भर दिखाया है। हम गंगा किनारे रहने वाले अपने घरों का कूड़ा-कचरा फेंकने, उद्योगिक कचरा डालने, सीवर लाइन गिराने, मुर्दे जलाने, पाखाना करने, पूजा करने के बाद मूर्तियाँ व पूजन-सामग्री फेंकने आदि अनेक कामों के लिए गंगाजी का ही इस्तेमाल तो करते हैं। यानि की हम गंगा नदी को 'कूड़ादान' की तरह इस्तेमाल तो कर सकते हैं पर उसे कूड़ादान कह नहीं सकते हैं, और अगर कोई और कह दे तो हमें मिर्ची लग जाती है या हमारी आस्था को चोट पहुँच जाती है। भाई इसी को कहते हैं दोहरे मापदंड अपनाना। होना तो यह चाहिए था कि हम संदिलान्ड्स महोदय की बात को सम्मान पूर्वक ग्रहण करते और यह संकल्प लेते की भविष्य में हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखेंगे। इसी के साथ राम-राम।
बातें मेरी, पसंद-नापसंद आपकी...
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Sunday, August 07, 2011
क्या गंगा नदी 'कूड़ादान' है...
आस्ट्रेलिया के ऍफ़. एम्. रेडियो होस्ट, श्रीमान कयले सैन्दीलान्ड्स ने एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान हमारी पवित्रतम नदी गंगा को 'कूड़ादान' कह दिया। भाई, बुरा तो हमको भी लगा क्योंकि हम भी गंगा किनारे के शहर कानपुर में जो बसते हैं। पर बुरा मानने के अलावा हम कुछ कर भी तो नहीं सकते हैं। पर, गौर से अगर हम गंगा या भारत की किसी भी अन्य नदी को देखें तो वह 'कूड़ादान' ही नज़र आती हैं, हो सकता है की सैन्दीलान्ड्स महोदय को भी गंगा की कोई ऐसी ही तस्वीर देखने को मिल गयी हो और वो उसे कूड़ादान समझ बैठे हों। और फिर सैन्दीलान्ड्स महोदय ने दरअसल में कुछ गलत भी नहीं कहा उन्होंने तो केवल हमे आईना भर दिखाया है। हम गंगा किनारे रहने वाले अपने घरों का कूड़ा-कचरा फेंकने, उद्योगिक कचरा डालने, सीवर लाइन गिराने, मुर्दे जलाने, पाखाना करने, पूजा करने के बाद मूर्तियाँ व पूजन-सामग्री फेंकने आदि अनेक कामों के लिए गंगाजी का ही इस्तेमाल तो करते हैं। यानि की हम गंगा नदी को 'कूड़ादान' की तरह इस्तेमाल तो कर सकते हैं पर उसे कूड़ादान कह नहीं सकते हैं, और अगर कोई और कह दे तो हमें मिर्ची लग जाती है या हमारी आस्था को चोट पहुँच जाती है। भाई इसी को कहते हैं दोहरे मापदंड अपनाना। होना तो यह चाहिए था कि हम संदिलान्ड्स महोदय की बात को सम्मान पूर्वक ग्रहण करते और यह संकल्प लेते की भविष्य में हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त रखेंगे। इसी के साथ राम-राम।
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