उत्तर प्रदेश में 'विधान सभा चुनाव-२०१२' का बिगुल बज चूका है। सभी पार्टियाँ पूरे दमखम के साथ मैदान में आ डटी है। पर वोटर खामोश है और मुद्दे गायब है। विकास, कानून-व्यवस्था, भ्रसटाचार आदि कि बातें कोई नहीं कर रहा है; अगर कुछ है तो केवल उलूल-जुलूल वादे। अब तक सभी दलों द्वारा की गयी घोषणाओं का लब्बोलुआब यही है, कि इस बार फिर यह चुनाव 'जाति-धर्म' के मुद्दे पर ही लड़ा जायेगा।'पंजे' वाली राष्ट्रीय पार्टी अपने युवराज के सहारे नैय्या पार लगाने कि कोशिश कर रही है, पर वो यह बताना नहीं भूलती कि उसने कितने अति-पिछड़ों को टिकट दिया और अल्पसंख्यक आरक्षण लाने का प्रयास केवल उसी के द्वारा किया गया। 'कमल' वाली राष्ट्रीय पार्टी ने जाति विशेष के वोटरों को लुभाने के लिए घोटाले में फंसे एक पूर्व मंत्री को लेने में जरा भी गुरेज नहीं किया और दूसरे प्रदेश कि एक साध्वी-नेत्री को पिछड़े वोटों के लालच में उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया। बाकी बची प्रदेश स्तरीय, 'साइकिल' और 'हाथी' वाली पार्टियां तो जातिगत आधार पर ही फल-फूल रही है। कुछ अन्य पार्टियों या मोर्चों का भी कमोबेश यही हाल है।
सभी पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों कि घोषणा करते समय यह जरूर बताया कि उसने किस जाति और धर्म के कितने लोगों को टिकट दिया है। किसी ने भी यह नहीं बताया कि उसके कितने प्रत्याशी पढ़े-लिखे, इमानदार, समाजसेवी, आदि है।
मतलब साफ़ है कि अभी प्रदेशवासियों को इमानदारी से बिना भेदभाव के विकास करने वाली सरकार के लिए इन्तजार ही करना पड़ेगा। ऐसा भी नहीं है कि सारी गलती पार्टियों कि ही है। अरे! हम भी तो इमानदारी से वोट नहीं डालते है। हम भी तो जाति, धर्म, भौकाल, लालच, भय आदि से प्रभावित होकर वोट देते है।
इमानदारी से वोट डालोगे, तभी तो ईमानदार सरकार पाओगे।
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